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दिल्ली एनसीआर में किसानों के आंदोलन से 50 हज़ार करोड़ का व्यापार हुआ नुकसान

सरकार का प्रस्ताव जायज है किसानों को अब स्वीकार करना चाहिए- कैट
 
दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में पिछले 55 दिनों से अधिक दिनों से चले आ रहे किसानों के आंदोलन से व्यापारियों को लगभग  50 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है एक भी ऐसे समय में जब कोरोना महामारी के कारण तबाह हुआ व्यापार जैसे तैसे ठीक होने के कगार पर था, ऐसे में किसानों के आंदोलन से हो रहे नुक़सान व्यापारियों के लिए बेहद चिंताजनक है। – कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने आज यहाँ कहा ।

सरकार के प्रस्ताव पर टिप्पणी करते हुए कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बी सी भरतिया और राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि “सरकार का हालिया प्रस्ताव जिसमें डेढ़ साल के लिए कृषि कानूनों को स्थगित करना तथा किसान नेताओं के साथ एक संयुक्त समिति बनाने का है, जो कि काफी न्यायसंगत और उचित है जो संकट को हल करने के लिए सरकार की इच्छा को इंगित करता है और इसलिए अब किसानों को कृषि समुदाय के बड़े हित और कृषि व्यापार में लगे अन्य वर्गों के बड़ी संख्या में लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए और अपना आंदोलन वापिस ले लेना चाहिए। यदि अब भी किसान सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करते हैं, तो यह माना जाएगा कि वे समाधान में रुचि नहीं रखते हैं और कुछ विभाजनकारी ताकतें समस्याएं बनाएँ रखने के लिए किसानों का उपयोग कर रही हैं ।

श्री भरतिया और श्री खंडेलवाल ने कहा कि कृषि कानून अकेले किसानों से नहीं जुड़े हैं। देश भर में लगभग 1.25 करोड़ व्यापारी मंडियों में काम कर रहे हैं और ये व्यापारी किसानों को न केवल अपनी फसल बेचने में सुविधा प्रदान करते हैं बल्कि उनकी ज़रूरत के समय में उनकी कई तरह से  मदद भी करते हैं। ये व्यापारी 4 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करते हैं। कृषि कानून में आपूर्ति श्रृंखला के इस महत्वपूर्ण घटक को ही हटाने के बारे में साफ़ कहा गया हैं। ऐसे में इन बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का क्या होगा। क्या वे एक ही झटके में अपनी आजीविका से बाहर हो जाएंगे? इन लोगों के हितों को भी संरक्षित करने की आवश्यकता है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या को नजरअंदाज नही किया जा सकता।

श्री भरतिया और श्री खंडेलवाल ने सरकार से अपील की है कि व्यापारियों को भी प्रस्तावित संयुक्त समिति में प्रतिनिधित्व दिया जाए। यदि व्यापारियों को विश्वास में लिए बिना कोई भी समझौता किया जाता है, तो कृषि अधिनियम मुद्दा विवादों में रहेगा और सरकार की अब तक क़ी सारी कवायद बेकार साबित हो सकती है। इसलिय इस विवादास्पद मुद्दे का व्यापक समाधान हो और सभी हितधारकों के वैध हित को संरक्षित किया जाए।