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‘पॉकेट में इश्क़’, इश्क़, प्यार, मुहब्बत, उल्फ़त जैसे खूबसूरत शब्द और इसके अहसास से जुड़ी हुई कहानियों का संग्रह

पॉकेट में इश्क सबके दिलों मे प्यार का एहसास भर देगी और ज़िंदगी मे खुशी: रेनू‘अंशुल’

नई दिल्ली। रेनू‘अंशुल’द्वारा लिखित‘पाकेट में इश्क’ कहानी संग्रह का विमोचन आज साहित्य अकादमी, नई दिल्ली में वरिष्ठ कथाकार श्री महेश दर्पण द्वारा किया गया।

‘पॉकेट में इश्क़’,जैसा कि इसके शीर्षक से ही ज़ाहिर है, इश्क़, प्यार, मुहब्बत, उल्फ़त जैसे खूबसूरत और हर दिल अज़ीज़, इस शब्द और इसके अहसास से जुड़ी हुई कहानियों का संग्रह है । पच्चीस छोटी – बड़ी इश्क़ की दास्तानों से सजी यह पॉकेट निश्चित ही सबके मन को प्यार से भर देगी।


इस अवसर पर पुस्तक की लेखिका रेनू‘अंशुल’नेकहा, “अपनी लिखी पिछली तीनों से अलग मिज़ाज है मेरी इस चौथी बुक का ! बुक के टाइटिल के रूप में भी और इसमें लिखी कहानियों के रुप में भी । पहली तीनों किताबों के शीर्षक जहां पढ़ने में साहित्यिक थे , जैसे – उसके सपनों के रंग , कहना है कुछ, लम्हों के दामन में… मगर इस बार शीर्षक है ‘पॉकेट में इश्क़’। आजकल जिस तरह हिन्दी- इंगलिश की मिली जुली भाषा हमारे बोलने के प्रचलन में है , और जैसा कि इसके टाइटिल से समझ आता है कि संग्रह की ‘पॉकेट ‘ इश्क़ के अहसासों से भरपूर है, उसकी हर कहानी इश्क़ की अलग अलग दास्तान सुनाती है ।

उन्होंने कहा कियूँ हम सभी मानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और एक साहित्यकार के रूप में जो कुछ हम देखते सुनते हैं वही अपने शब्दों में उकेरते हैं । यूँ तो प्यार सिर्फ़ प्यार होता है – दिल का एक खूबसूरत सा अहसास, लेकिन देखा जाए तो आज के मोर्डन लव का स्वरूप बिलकुल बदला हुआ है । जहां आज के युवा वर्ग को इन्सटेंट फ़ास्ट फ़ूड की तरह प्यार भी बिलकुल इन्स्टेंट ही चाहिये । पल में तोला , पल में माशा की तर्ज़ पर अभी प्यार तो अभी तकरार , अभी ब्रेकअप तो अभी दोस्ती …..। मैं देखती हूँ कि सोच का यह फ़र्क न सिर्फ़ हमारे युवाओं में आया है बल्कि हमारे बड़े लोगों की भी इस विषय में सोच बदली है । आज वो भी प्यार को दिल में न दबाकर अपने मन की बात कहना पसंद करते हैं और अपनी तन्हा ज़िन्दगी को ख़ुशनुमा बनाने की कोशिश करते हैं । संग्रह की कहानियाँ- ‘राँग नम्बर’, ‘कहो न प्यार है’, ‘जी लो ज़िन्दगी’प्यार के उसी रूप को दर्शाती हैं। मार्डन लव का शायद यही स्वरूप मैंने इस संग्रह की कहानियों में दिखाने की कोशिश की है । कहानी का मार्डन टाइटिल ‘पॉकेट में इश्क़’मेरी इस सोच को पूरी तरह सार्थक करता है ।

रेनू अंशुल ने बताया किइन प्यार भरी कहानियों की शुरुआत कोरोना के उस शुरूआती दौर में हुई जब लॉकडाउन के तहत दूरियाँ नज़दीकियाँ बन गईं । सबको अपने अपने परिजनों और परिवारों के बीच रहने और समय बिताने का मौक़ा मिला । उनके प्यार और उनके साथ की अहमियत महसूस हुई और तब अपनी कहानियों के रूप में मुझे सबको यह महसूस कराने का मौक़ा मिला कि अपने और अपनों का प्यार हमारी ज़िन्दगी के लिये कितना मायने रखता है ।


रेनू अंशुल ने और जानकारी देते हुए कहा किपुस्तक कीकहानियां यह भी संदेश देती हैं कि प्यार को उम्र का बंधन मत मानो कभी । जिस किसी भी उम्र में यह आपको मिले , इसे बढ़कर गले लगा लो क्योंकि प्यार जिस उम्र में मिल जाए , वो हमारे जीवन को ख़ुशियों से भर देता है । आजकल की भागदौड़ में और भौतिकवादी समय में किसी का प्यार भरा साथ ही आपको सब परेशानियों से जूझने का संबल देता है और हौसला भी । मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरी ‘पॉकेट में इश्क़’बेशक सबके दिलों में प्यार का अहसास भर देगी और ज़िन्दगी में हँसी- ख़ुशी।

इस संकलन की ख़ास बात यह है कि कहानियों के किरदार हर उम्र से आते हैं, युवावस्था की ‘पम्मी’ तो लगता है जैसे हमारे आसपास का ही किरदार है। फिर ‘ बाई चांस‘ की हवाई यात्रा में ऐसे किरदार अमूमन मिल ही जाते हैं ।

नुपुर ने जिस तरह मयंक का ‘दिल चुरा लिया‘ वो आज के युवाओं में भारतीय मूल्यों की कसौटी है । जिस पर गर्व किया जा सकता है ।‘ बेस्ट फ्रेन्डस‘ तो होते ही ऐसे हैं जो अपनी दोस्ती में कुछ भी कुर्बान कर दें, तो भला निशा और कविता के किरदार भी कैसे अलग हो सकते हैं ।
इश्क़ हो और ‘ कान की बाली‘ का ‘ कन्फ्यूजन‘ न हो ऐसा शायद ही होता होगा क्योंकि लॉकडाउन में ‘ लाँग डिस्टेंस रिलेशनशिप ‘ भी मनु और विदुषी को निभानी पड़ी, वो भी एक बेहतरीन तरीक़े से ।कहानी संग्रह की हर कहानी प्रेम की चाशनी में डूबी जलेबियों की तरह हैं जो हर हाल में अपने इश्क़ के उन्माद में डूबी हुई है ।